नाना पाटेकर: शोहरत से परे एक इंसान…
गुरुवार, 8 अक्टूबर को जब सोशल मीडिया पर एक ख़बर गर्दिश करने लगी कि “नाना नहीं रहे”, तो मानो अचानक सोशल मीडिया पर सन्नाटा-सा छा गया। फ़ेक न्यूज़ के इस दौर में हर कोई ख़बर की पुष्टि करने में जुट गया। लेकिन जब नाना पाटेकर के मृत्यु की ख़बर की पुष्टि सामने आई, तो यह ख़बर उनके चाहने वालों के लिए एक गहरे सदमे में बदल गई।
अपडेट: 10/10/2026, 1:37:53 pm IST

THE PLANET REPORT
60 सेकंड में समझें
- नाना पाटेकर (1951–2026): 5 मुख्य बातें
- सिनेमा: ग़रीबी से उबरकर कई राष्ट्रीय पुरस्कार और पद्मश्री हासिल किए।
- समाज सेवा: किसानों की मदद के लिए ₹1.5 करोड़ दिए और नाम फ़ाउंडेशन बनाया।
- सादगी: चकाचौंध से दूर रहे; 12 मन सूखी लकड़ी को अपनी असली दौलत माना।
ख़बरों के मुताबिक़, गुरुवार तड़के नाना गोवा स्थित अपने घर पर बेहोशी की हालत में पाए गए। उन्हें तक़रीबन 45 मिनट तक CPR दिया गया और फिर अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने कार्डिएक अरेस्ट की वजह से उन्हें मृत घोषित कर दिया।
साल 1951 में महाराष्ट्र के मुरुड-जंजीरा में जन्मे विश्वनाथ पाटेकर उर्फ़ नाना पाटेकर हिंदी और मराठी सिनेमा के दिग्गज अभिनेता थे। मगर उनकी पहचान सिर्फ़ एक अभिनेता तक महदूद नहीं थी। वह लाखों लोगों के दिलों की आवाज़, ज़रूरतमंदों के मददगार और ग़रीब किसानों का सहारा बनने वाले इंसान के तौर पर भी जाने जाते थे।
उनकी मृत्यु से कुछ दिन पहले गोवा के एक कार्यक्रम का वीडियो चर्चा में आया, जिसमें वह कहते सुनाई दिए कि "एक दिन सभी को इस दुनिया से जाना है, पता नहीं अगले दिन वह यहां रहेंगे या नहीं। आज उनके जाने की ख़बर के बीच इस बयान को याद करके लोगों की आंखें नम हो रही हैं। सचमुच कभी-कभी इंसान की कही हुई बातें उसके जाने के बाद नए मायने अख़्तियार कर लेती हैं।
• संघर्ष से कामयाबी तक :
75 साल की उम्र में दुनिया से रुख़्सत हुए नाना का शुरुआती जीवन संघर्षों से भरा था। उन्होंने महज़ 13 साल की उम्र में काम करना शुरू कर दिया था। स्कूल के बाद मुंबई के चूनाभट्टी इलाक़े में फ़िल्मों के पोस्टर पेंट करने जाते थे। एक पुराने इंटरव्यू के मुताबिक़, इस काम के लिए उन्हें महीने के सिर्फ़ 35 रुपये मिलते थे और वह कई किलोमीटर पैदल चलकर काम पर जाते थे। बचपन के इन्हीं मुश्किल तजुर्बों ने उन्हें ज़िंदगी और इंसानी तकलीफ़ों को क़रीब से समझने का मौक़ा दिया।
मुज़फ़्फ़र अली की फ़िल्म 'गमन' से उन्होंने बड़े पर्दे पर अपने फ़िल्मी सफ़र की शुरुआत की। 'तिरंगा' और 'क्रांतिवीर' जैसी फ़िल्मों ने उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए। इसके बाद उन्होंने एक से बढ़कर एक फ़िल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया। 'परिंदा', 'क्रांतिवीर' और 'अग्निसाक्षी' में उनके अभिनय के लिए उन्हें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। वहीं, साल 2013 में कला के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से भी नवाज़ा गया।
मगर नाना की ज़िंदगी का एक ऐसा पहलू भी था, जो उनकी फ़िल्मी कामयाबी से कहीं आगे था—और वह था दूसरों के दर्द को अपना दर्द समझना।
• किसानों के दर्द को अपना दर्द समझा :-
साल 2015 में महाराष्ट्र भयंकर सूखे की चपेट में था। फ़सलें बर्बाद हो रही थीं और किसानों की आत्महत्या की ख़बरें लगातार सामने आ रही थीं। ऐसे मुश्किल हालात में नाना ने किसानों की मदद करने का फ़ैसला किया। बताया जाता है कि उन्होंने अपनी कार ख़रीदने के लिए जमा किए गए क़रीब डेढ़ करोड़ रुपये किसानों की मदद के लिए देने का मन बनाया।
किसानों के पास पानी जैसी बुनियादी सुविधा नहीं और वह ख़ुद गाड़ी में सफ़र करें—यह ख़याल उन्हें कचोटने लगा। उन्होंने अपने दोस्त और फ़िल्मकार मकरंद अनासपुरे से संपर्क किया और ज़रूरतमंद किसानों तक मदद पहुंचाने की योजना बनाई।
लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि कुछ हज़ार रुपये की आर्थिक मदद से किसानों की ज़िंदगी की बुनियादी समस्याएं हल नहीं होंगी। असल समस्या पानी की कमी और सूखे से जुड़ी थी। लिहाज़ा, सितंबर 2015 में उन्होंने मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 'नाम फ़ाउंडेशन' की शुरुआत की। इस संस्था के ज़रिये किसानों की मदद, जल-संरक्षण और सूखा प्रभावित इलाक़ों में राहत के काम किए गए।
यह पहल बताती है कि किसी इंसान की असल महानता सिर्फ़ उसकी शोहरत या दौलत में नहीं होती, बल्कि इस बात में होती है कि वह दूसरों की तकलीफ़ को कितना महसूस करता है और उसे दूर करने के लिए क्या करता है।
• मौत से बेख़ौफ़, ज़िंदगी की हक़ीक़त से वाक़िफ़ क्रांतिवीर;
नाना पाटेकर एक जिंदादिल और रहमदिल शख़्स थे। ग्लैमर की दुनिया में रहते हुए भी वह दिखावे की ज़िंदगी से दूर और अपने बेबाक अंदाज़ के लिए मशहूर रहे। उनकी सादगी सिर्फ़ पर्दे पर निभाए किरदारों तक महदूद नहीं थी, बल्कि उनकी असल ज़िंदगी में भी इसकी झलक दिखाई देती थी।
वर्ष 2023 में फ़िल्म 'द वैक्सीन वॉर' के दौरान एक इंटरव्यू में उन्होंने मौत और ज़िंदगी के बारे में अपनी सोच कुछ यूं बयान की थी:
"मौत एक सच्चाई है और इस सच्चाई से भागकर हम कहां जाएंगे? मुझे मालूम है कि एक दिन मुझे जाना है, इसलिए जिंदगी में बहुत ज्यादा जमा करने, बहुत ज्यादा पैसे कमाने या चीजें इकट्ठी करने का कोई मतलब मुझे समझ नहीं आता। मैंने तो अपनी आखिरी संपत्ति भी तय कर रखी है। मुझे मालूम है कि अंत में मुझे सिर्फ 12 मन लकड़ी लगने वाली है, यही मेरी अंतिम संपत्ति है। मैंने अपने लिए लकड़ियां जमा करके रखी हैं। वो सूखी हैं। मैंने कह रखा है कि जब मेरा अंतिम संस्कार हो, तो उन्हीं लकड़ियों का इस्तेमाल करना। गीली लकड़ी मत लगाना, वरना धुआं आएगा। दोस्त लोग जो जमा होंगे उनकी आंख में धुआं लगेगा, फिर आंख से पानी आएगा। फिर मुझे ऊपर से भी गलतफहमी हो सकती है कि ये लोग मेरे लिए रो रहे हैं। कम से कम मरते वक्त ऐसी गलतफहमी तो नहीं होनी चाहिए......
सूत्रों के मुताबिक़, नाना 8 अक्टूबर को 'कौन बनेगा करोड़पति' कार्यक्रम में भी शामिल होने वाले थे, जहां से मिलने वाली धनराशि को वह किसानों की मदद के लिए अपने 'नाम फ़ाउंडेशन' के काम में लगाना चाहते थे। लेकिन शायद खुदा को कुछ और ही मंजूर था और वो पहले ही रुखसत हो गए
आज नाना हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके किरदार, उनकी आवाज़, उनकी बेबाकी और ज़रूरतमंदों के लिए किए गए काम उनकी याद को ज़िंदा रखेंगे। आख़िरकार, इंसान अपने साथ अपनी दौलत और शोहरत लेकर नहीं जाता। पीछे रह जाते हैं उसके काम, उसकी यादें और वह असर, जो उसने दूसरों की ज़िंदगी पर छोड़ा होता है। और शायद यही किसी इंसान की सबसे बड़ी विरासत है।
