कपिल मिश्रा से अनुराग ठाकुर तक कई नाम गिनाए, डॉ. संदीप ने पूछा—हेट स्पीच पर कानून किसके लिए?
देश में हेट स्पीच और कानून के इस्तेमाल को लेकर डॉ. संदीप ने BJP के कई बड़े नेताओं का नाम लेते हुए गंभीर सवाल उठाए हैं। कपिल मिश्रा, रमेश बिधूड़ी, अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा से लेकर कई मुख्यमंत्रियों के विवादित बयानों का जिक्र करते हुए उन्होंने पूछा कि जब राजनीतिक नेताओं पर धार्मिक और सांप्रदायिक टिप्पणी के आरोप लगते हैं, तो कार्रवाई का पैमाना क्या होता है? इसी के साथ उन्होंने आकृति चौधरी NSA मामले को भी कानून के समान इस्तेमाल की बहस से जोड़ा।
अपडेट: 27/9/2026, 3:58:41 am IST

THE PLANET REPORT
60 सेकंड में समझें
- देश में हेट स्पीच को लेकर डॉ. संदीप ने कई बड़े राजनीतिक नाम गिनाते हुए कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं।
- उन्होंने दावा किया कि पूरे भारत में 1,165 हेट स्पीच की घटनाएं सामने आईं और इनमें बड़ी संख्या BJP नेताओं से जुड़ी रही।
नई दिल्ली: “अगर हेट स्पीच पर कानून है, तो उसका इस्तेमाल आखिर किसके खिलाफ और किस पैमाने पर होता है?”
डॉ. संदीप ने देश में हेट स्पीच, राजनीतिक बयानबाजी और कानून के इस्तेमाल को लेकर इसी सवाल के साथ कई बड़े राजनीतिक नामों और पुराने विवादों का जिक्र किया।
अपने वक्तव्य में उन्होंने दावा किया कि देशभर में 1,165 हेट स्पीच की घटनाएं सामने आई हैं और इनमें बड़ी संख्या BJP नेताओं से जुड़ी है। उन्होंने यह भी कहा कि इनमें सैकड़ों मामले गंभीर श्रेणी के हैं।
लेकिन डॉ. संदीप की बात सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रही। उन्होंने एक-एक कर कई चर्चित राजनीतिक मामलों का नाम लेते हुए पूछा कि आखिर ऐसे मामलों में जवाबदेही का पैमाना क्या है?
कपिल मिश्रा और 2020 दिल्ली दंगों का जिक्र
सबसे पहले उन्होंने BJP नेता कपिल मिश्रा का नाम लिया।
डॉ. संदीप ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों से पहले कपिल मिश्रा के भाषण को लेकर उठे विवाद और उन पर लगे हेट स्पीच के आरोपों का उल्लेख किया।
उन्होंने सवाल किया कि जब किसी बड़े राजनीतिक नेता के बयान पर इतना गंभीर विवाद खड़ा हो, तो उसके बाद होने वाली कानूनी कार्रवाई का असर आम लोगों को क्यों दिखाई नहीं देता?
संसद के अंदर रमेश बिधूड़ी की टिप्पणी
इसके बाद डॉ. संदीप ने पूर्व BJP सांसद रमेश बिधूड़ी का मामला उठाया।
2023 में लोकसभा के भीतर तत्कालीन BSP सांसद दानिश अली के खिलाफ धार्मिक पहचान से जुड़ी आपत्तिजनक भाषा के इस्तेमाल पर बड़ा विवाद हुआ था।
डॉ. संदीप ने इस घटना का उदाहरण देते हुए कहा कि जब देश की संसद के भीतर भी ऐसी भाषा सामने आती है, तो राजनीतिक और कानूनी जवाबदेही का सवाल और बड़ा हो जाता है।
‘घुसपैठिए’, ‘लव जिहाद’ और दूसरे राजनीतिक शब्दों पर सवाल
डॉ. संदीप ने अपने वक्तव्य में BJP के शीर्ष नेताओं के विभिन्न बयानों का भी जिक्र किया।
उन्होंने ‘घुसपैठिए’, ‘लव जिहाद’, ‘लैंड जिहाद’, ‘श्मशान-कब्रिस्तान’ जैसे शब्दों और राजनीतिक नारों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस तरह की भाषा दो समुदायों के बीच दूरी और तनाव बढ़ाने वाली हो सकती है।
उन्होंने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत कई नेताओं के नाम लिए।
डॉ. संदीप ने आरोप लगाया कि अलग-अलग मौकों पर धार्मिक पहचान से जुड़े बयान दिए गए, लेकिन इन मामलों में गंभीर कानूनी कार्रवाई कम दिखाई देती है।
अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा का नाम भी लिया
डॉ. संदीप ने अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा से जुड़े 2020 के विवादों का भी जिक्र किया।
दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान सामने आए कुछ नारों और भाषणों पर उस समय राजनीतिक विवाद हुआ था और अदालतों तक मामला पहुंचा।
डॉ. संदीप ने इसे उदाहरण बनाते हुए पूछा कि यदि विवादित राजनीतिक भाषण अदालतों तक पहुंचते हैं, लेकिन अंततः आपराधिक कार्रवाई नहीं बनती, तो हेट स्पीच की कानूनी सीमा आखिर तय कैसे होती है?
कई और नेताओं का जिक्र
अपने वक्तव्य में डॉ. संदीप ने टी. राजा सिंह, नितेश राणे, अश्विनी उपाध्याय और दूसरे नेताओं के नाम भी लिए।
उनका आरोप था कि विभिन्न मौकों पर इन नेताओं पर धार्मिक समुदायों को लेकर आपत्तिजनक या सांप्रदायिक टिप्पणी करने के आरोप लगे हैं।
डॉ. संदीप ने सवाल उठाया कि जब इस तरह के मामले बार-बार सामने आते हैं, तो क्या सिर्फ राजनीतिक विवाद होना पर्याप्त है या कानून को भी स्पष्ट और समान रूप से कार्रवाई करनी चाहिए?
‘कानून का डर खत्म हो जाए तो क्या होता है?’
अपने बयान के दूसरे हिस्से में डॉ. संदीप ने एक ऐसे आरोपी का जिक्र किया, जिसने कथित अपराध के बाद कैमरे के सामने अपनी भूमिका स्वीकार करने जैसा व्यवहार किया।
उन्होंने सवाल किया कि किसी व्यक्ति को कानून और पुलिस का इतना कम डर कैसे हो सकता है कि वह सार्वजनिक रूप से सामने आकर अपने कथित कृत्य के बारे में बात करे?
डॉ. संदीप के मुताबिक यह सवाल सिर्फ एक आरोपी का नहीं, बल्कि कानून के भय और पुलिस की प्रभावशीलता का भी है।
आकृति चौधरी NSA मामला भी उठाया
इसके बाद डॉ. संदीप ने गौतम बुद्ध नगर के आकृति चौधरी NSA मामले का जिक्र किया।
इस मामले में अदालत ने NSA के इस्तेमाल और प्रशासनिक कार्रवाई की समीक्षा की थी।
डॉ. संदीप ने इसे राजनीतिक हेट स्पीच के मामलों से तुलना करते हुए प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल पर सवाल उठाया।
उनका तर्क था कि एक तरफ बड़े राजनीतिक नेताओं के विवादित बयानों को लेकर लंबी कानूनी प्रक्रिया दिखाई देती है, जबकि दूसरी तरफ आम नागरिकों पर कठोर कानूनों का इस्तेमाल तेजी से किया जाता है।
आखिर सवाल क्या है?
डॉ. संदीप के पूरे वक्तव्य का सबसे बड़ा सवाल किसी एक नेता या एक राजनीतिक दल से आगे जाता है।
उनका सवाल है—
क्या भारत में कानून हर व्यक्ति के लिए समान गति, समान गंभीरता और समान पैमाने से लागू होता है?
हेट स्पीच, राजनीतिक बयानबाजी, पुलिस कार्रवाई और प्रशासनिक शक्तियों से जुड़े अलग-अलग मामलों के बीच यही सवाल अब सार्वजनिक बहस के केंद्र में है।
कानून क्या कहता है, अदालतें क्या फैसला देती हैं और राजनीतिक आरोप क्या हैं—इन तीनों के बीच अंतर जरूरी है। लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक सवाल हमेशा बना रहता है: कानून की नजर में समानता सिर्फ संविधान में लिखी व्यवस्था है, या जमीन पर भी उसी तरह दिखाई देती है?
स्रोत और पठन नोट
यह सामान्य पठन के लिए मूल रीडर गाइड है। इसे ताज़ा घटना की रिपोर्ट या सत्यापित फैक्ट-चेक के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।
