सहारनपुर से उज्जैन तक मस्जिदों पर कार्रवाई: अतिक्रमण, विकास और अधिकारों के बीच क्या कहता है कानून ?
मध्य प्रदेश के उज्जैन की शाही मस्जिद का एक हिस्सा हटाए जाने को लेकर 28 सितंबर 2026 को शहर में तनाव, प्रदर्शन और पुलिस से टकराव देखने को मिला। सड़क चौड़ीकरण को लेकर शुरू हुआ विवाद अदालत पहुँचा, रातभर लोग मस्जिद के आसपास जमा रहे और अगले दिन कुछ स्थानों पर पथराव हुआ। पुलिस ने आंसू गैस और हल्का बल प्रयोग किया। लगभग 2,500 पुलिस और Rapid Action Force कर्मियों की तैनाती की गई। पुलिस के अनुसार 15 लोगों को हिरासत में लिया गया और सात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई; इनमें कुछ social-media content creators भी शामिल थे।
अपडेट: 29/9/2026, 9:02:10 pm IST
60 सेकंड में समझें
- उज्जैन: सड़क चौड़ीकरण के लिए मस्जिद का हिस्सा हटाया गया।
- सुप्रीम कोर्ट: नोटिस और सुनवाई जरूरी।
- कानूनी प्रक्रिया: कई ध्वस्तीकरण मामलों पर सवाल उठे।
- निशाना बनाने की बहस: भेदभाव के दावे विवादित हैं।
- हल्द्वानी: ध्वस्तीकरण के बाद बड़ी हिंसा हुई।
नई दिल्ली | 29 सितंबर 2026
पिछले कुछ वर्षों के प्रमुख मामलों की पड़ताल; सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में तय की थी demolition से पहले notice, hearing और appeal की प्रक्रिया
शाही मस्जिद प्रबंधन को उज्जैन नगर निगम ने 14 अगस्त, 25 अगस्त और 27 अगस्त 2026 को notices तथा 1 सितंबर 2026 को final notice/order दिया था। मस्जिद पक्ष ने इसे मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चुनौती दी। 9 सितंबर 2026 को हाई कोर्ट की single bench ने याचिकाएँ खारिज कर दीं। रिकॉर्ड में अदालत ने यह भी ध्यान में लिया कि उसी road-widening project में अन्य धार्मिक structures—जिनमें मंदिर भी शामिल थे—पर कार्रवाई हुई थी।
बाद में मामला division bench पहुँचा। 28 सितंबर को मस्जिद कमेटी और नगर निगम के बीच समझौते की जानकारी अदालत को दी गई और appeals dispose कर दी गईं। रिपोर्टों के अनुसार पहले करीब 9.5 फुट हिस्सा हटाने की बात थी, जबकि समझौते के बाद करीब तीन फुट हिस्सा हटाने और मीनार को परिसर के भीतर relocate करने पर सहमति बनी। अदालत ने निगम की लिखित assurances को binding बताया।
गुजरात का Gir Somnath मामला भी क्यों महत्वपूर्ण है?
28 सितंबर 2024 को गुजरात के Prabhas Patan में प्रशासन ने नौ मुस्लिम धार्मिक structures—mosques और dargahs सहित—और 45 अन्य पक्के structures हटाए। प्रशासन ने दावा किया कि ये सरकारी जमीन पर encroachments थे और notices दिए गए थे। कार्रवाई के दौरान करीब 1,400 पुलिसकर्मी तैनात किए गए और बड़ी संख्या में लोगों को हिरासत में लिया गया। भीड़ हटाने के लिए lathi-charge की भी रिपोर्ट हुई।
Pir Haji Mangroli Shah Dargah के मामले में बाद में Supreme Court के सामने contempt petition पहुँची। Petitioners ने आरोप लगाया कि Collector का 27 सितंबर का आदेश उन्हें demolition के बाद 29 सितंबर को मिला। Supreme Court ने Gujarat authorities से जवाब मांगा। यह allegation अभी अपने आप में अंतिम judicial finding नहीं था।
सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट नियम: बुलडोजर “सजा” नहीं बन सकता
13 नवंबर 2024 को Supreme Court ने In Re: Directions in the Matter of Demolition of Structures, 2024 INSC 866 में पूरे देश के लिए महत्वपूर्ण safeguards तय किए।
Court ने स्पष्ट किया कि सरकार या प्रशासन किसी व्यक्ति को अपराध का आरोपी होने के कारण उसकी property demolish करके अपने स्तर पर “सजा” नहीं दे सकता। ऐसी कार्रवाई rule of law और separation of powers के खिलाफ होगी।
सामान्य मामलों में demolition से पहले show-cause notice देना आवश्यक है। Local law में जितना समय हो या notice मिलने के बाद कम-से-कम 15 दिन—जो अधिक हो— जवाब के लिए मिलने चाहिए। Notice registered post से भेजने और structure पर चस्पा करने का निर्देश है। Notice की जानकारी District Magistrate/Collector को digitally भेजने की व्यवस्था भी Court ने निर्धारित की।
इसके बाद संबंधित व्यक्ति को personal hearing का अवसर देना होगा और hearing की minutes record करनी होंगी। Final order में यह बताया जाना चाहिए कि objections क्यों स्वीकार या अस्वीकार हुए, construction compoundable क्यों नहीं है, यदि केवल एक हिस्सा illegal है तो पूरे structure को गिराना क्यों जरूरी है और demolition के अलावा दूसरा विकल्प क्यों नहीं है।
इसके बाद संबंधित व्यक्ति को personal hearing का अवसर देना होगा और hearing की minutes record करनी होंगी। Final order में यह बताया जाना चाहिए कि objections क्यों स्वीकार या अस्वीकार हुए, construction compoundable क्यों नहीं है, यदि केवल एक हिस्सा illegal है तो पूरे structure को गिराना क्यों जरूरी है और demolition के अलावा दूसरा विकल्प क्यों नहीं है।
Final order के बाद सामान्यतः 15 दिन का समय judicial appeal/review और व्यक्ति को स्वयं unauthorized हिस्सा हटाने के लिए दिया जाना चाहिए। Demolition की videography होगी, inspection report बनाई जाएगी और participating police तथा civil personnel का record रखा जाएगा।
Court ने यह भी कहा कि उसके directions के उल्लंघन में demolition पाया गया तो संबंधित अधिकारी contempt/prosecution का सामना कर सकते हैं और property restoration तथा damages की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी उन पर डाली जा सकती है।
हालाँकि एक महत्वपूर्ण exception है: unauthorized construction अगर road, street, footpath, railway line, river/water body जैसी public place पर हो या किसी competent court ने demolition का सीधा आदेश दिया हो, तो Supreme Court के ये सामान्य directions उसी रूप में लागू नहीं होते।
फिर प्रशासन पर सवाल कहाँ उठता है?
समस्या हर demolition को “illegal” कहने की नहीं है। कई cases में सरकारी जमीन, road widening या unauthorized construction का documentary record मौजूद है। Ujjain और Shalimar Bagh में court proceedings और road-widening orders मौजूद हैं।
लेकिन दूसरी तरफ Saharanpur जैसे मामले में सवाल यह है कि जब court ने eviction uphold किया लेकिन demolition का अलग स्पष्ट आदेश नहीं दिया, तो administration ने इतनी तेजी से पूरा structure क्यों हटा दिया और High Court जाने का व्यावहारिक अवसर कितना मिला? Mosque committee ने यही objection उठाया, जबकि administration ने कहा कि eviction का अर्थ premises हटाना था।
Mehrauli में Delhi High Court को demolition के बाद DDA से यह पूछना पड़ा कि prior notice दिया गया था या नहीं। Kushinagar में Supreme Court ने contempt notice जारी किया। Jahangirpuri में Supreme Court के status-quo order के बाद भी demolition कुछ समय जारी रहने की रिपोर्ट हुई। ये घटनाएँ प्रशासनिक जवाबदेही पर वास्तविक सवाल पैदा करती हैं।
क्या मुस्लिम धार्मिक स्थलों को चुनकर निशाना बनाया जा रहा है?
इस प्रश्न पर अलग-अलग पक्षों के दावे हैं और इसे हर मामले के लिए एक ही निष्कर्ष में बदलना सही नहीं होगा।
Amnesty International ने फरवरी 2024 की अपनी investigation में Assam, Delhi, Gujarat, Madhya Pradesh और Uttar Pradesh में अप्रैल से जून 2022 के दौरान 128 Muslim-owned properties की punitive demolitions document करने का दावा किया। उसके अनुसार कम-से-कम 617 लोग प्रभावित हुए। Amnesty ने इन्हें discriminatory और collective punishment बताया। यह Amnesty की finding है, किसी भारतीय अदालत द्वारा सभी 128 मामलों पर दिया गया सामूहिक फैसला नहीं।
वहीं Ujjain के 2026 मामले में उपलब्ध court record से यह भी सामने आया कि road-widening exercise में मंदिरों और अन्य religious structures पर भी कार्रवाई की गई थी और High Court ने discrimination का तर्क स्वीकार नहीं किया। इसलिए हर demolition को केवल धार्मिक पहचान के आधार पर समझना evidence से मेल नहीं खाएगा।
फिर भी बार-बार सुबह-सुबह या रात में कार्रवाई, भारी पुलिस deployment, documents निकालने या अदालत पहुँचने के लिए कम समय मिलने के आरोप और धार्मिक स्थल से जुड़े मामलों में तत्काल demolition—ये ऐसे मुद्दे हैं जिनकी जांच सरकारों और स्थानीय प्रशासन को पारदर्शी तरीके से करनी चाहिए। कानून अवैध निर्माण हटाने की शक्ति देता है; लेकिन वह प्रक्रिया छोड़ने या किसी समुदाय को सामूहिक रूप से दंडित करने की शक्ति नहीं देता। यही नवंबर 2024 के Supreme Court judgment का केंद्रीय सिद्धांत है।
हिंसा और पुलिस कार्रवाई: सबसे गंभीर मामला हल्द्वानी
इन मामलों में सभी जगह दंगे नहीं हुए।
Ujjain में सितंबर 2026 में पथराव और police action हुआ, लेकिन स्थिति उसी दिन control में बताई गई। Saharanpur, Shalimar Bagh, Mehrauli और Bengali Market में भारी पुलिस deployment के बावजूद इस स्तर की हिंसा की verified reporting नहीं मिली।
इसके विपरीत Haldwani, 8 February 2024 में demolition के बाद स्थिति बड़े पैमाने पर हिंसक हुई। आगजनी और stone-pelting हुआ, police station और वाहनों को नुकसान पहुँचा, curfew लगाया गया और shoot-at-sight orders जारी हुए। High Court के समक्ष बाद में रखे गए विवरणों में छह मौतों और 100 से अधिक लोगों के घायल होने का उल्लेख सामने आया। Police ने इसके बाद बड़ी संख्या में arrests कीं।
इस घटना से एक और सवाल निकलता है: धार्मिक स्थल से जुड़ी संवेदनशील demolition कार्रवाई में administration ने पहले संवाद, mediation और de-escalation के सभी विकल्प पर्याप्त रूप से इस्तेमाल किए या नहीं? इसी के समानांतर यह भी तथ्य है कि हिंसक पथराव और आगजनी स्वयं कानूनन अपराध हैं और demolition dispute उन्हें वैध नहीं बनाता।
